Monday, July 29, 2019

मेरा साहित्यिक जीवन

मेरे साहित्यिक जीवन का प्रारम्भ वर्ष 2003- 04 के लगभग हुआ था जब मैं पहली बार जिला बार एसोसिएशन, इलाहाबाद के द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन को सुनने गया था जिसमें मुझे यश शेष कैलाश गौतम जी एवं श्री कमलेश द्विवेदी जैसे श्रेष्ठ कवियों को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ था।

मेरा जीवन

माघ मास, नवमी, कृष्ण पक्ष का साथ मिला
दो हजार पैंतीस विक्रम संवत का हुआ राज।
जब विचरण करती स्वाति आयी नक्षत्रलोक
चातक जातक बनकर निरखी हुआ विराज।।

प्रथम बार ध्वज प्रणाम

मैंने प्रथम बार ध्वज प्रणाम अपनी ननिहाल में किया था जब मैं बहुत छोटा था, उस समय मेरीआयु लगभग 11-12 वर्ष रही होगी। मेरे प्रथम ध्वज प्रणाम की स्मृति सदैव इसलिये भीअविस्मरणीय रही है क्योंकि ध्वज प्रणाम करते समय ध्वज दण्ड से मस्तक के स्पर्श के प्रयत्न में ध्वज को ही असन्तुलित कर बैठा था। फिर मेरे ममेरे भाई ने ध्वज को सन्तुलित किया।

श्री गुरु पूजन कार्यक्रम

मैंने श्री गुरु पूजन कार्यक्रम में लगभग वर्ष 2014 से जाना प्रारम्भ किया था और यह भी एक सत्य हैं कि सर्व प्रथम अधिवक्ता मिलन, प्रयाग महानगर के द्वारा किये गये श्री गुरु पूजन कार्यक्रम से ही प्रारम्भ किया था जो कि अनवरत चल रहा हैं।

इसका यह आशय कदापि नही है कि यह प्रथम वर्ष था जब मेरा परिचय़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ था। इससे पूर्व भी मैं  प्रयाग महानगर में स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय में जाता रहता था और तत्कालीन विभाग प्रचारक श्रीमान मनोज जी (वर्तमान में सह-प्रान्त प्रचारक, अवध) का मार्गदर्शन प्राप्त करता रहता था। तत्कालीन विभाग प्रचारक श्रीमान मनोज जी से मेरा परिचय काशी क्षेत्र के भाजपा नेता श्री दिवाकर नाथ त्रिपाठी जी ने अप्रैल 2013 में कराया, जिस मुलाकात का उद्देश्य अटल बिहारी वाजपयी विचार मंच की स्थापना था। कुछ कारणों से अटल बिहारी वाजपयी विचार मंच का विचार तो आगे नही ले जा सका किन्तु तत्कालीन विभाग प्रचारक,  प्रयाग महानगर श्रीमान मनोज जी का मार्गदर्शन प्राप्त करता रहा। और जब मुझसे श्री गुरु पूजन कार्यक्रम में आने का आग्रह किया गया तो मैं सहर्ष तैयार हो गया।


किन्तु यह मेरा प्रथम ध्वज प्रणाम नही था। मैंने प्रथम बार ध्वज प्रणाम अपनी ननिहाल में किया था जब मैं बहुत छोटा था, उस समय मेरीआयु लगभग 11-12 वर्ष रही होगी। मेरे प्रथम ध्वज प्रणाम की स्मृति सदैव इसलिये भीअविस्मरणीय रही है क्योंकि ध्वज प्रणाम करते समय ध्वज दण्ड से मस्तक के स्पर्श के प्रयत्न में ध्वज को ही असन्तुलित कर बैठा था। फिर मेरे ममेरे भाई ने ध्वज को सन्तुलित किया।